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कांग्रेस संघ का भवन नींव है, भाजपा का विकल्‍प नहीं

कांग्रेस संघ के भवन की नींव है, भाजपा का विकल्‍प नहीं -मुकेश असीम

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31 अक्टूबर 1984 और उसके बाद के दिन बहुत भयावह थे जब इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस हुकूमत ने कांग्रेसी गुंडों और लूट के लालच में इकठ्ठा किये गए भाड़े के अपराधियों को खुली छूट दी थी हजारों निर्दोष सिक्खों का क़त्ल करने की।* यह सब पुलिस के संरक्षण में हुआ था और 3 दिन बाद लुटेरों की तलाशी लेते हुए उनसे फिर सारा माल लूटकर पुलिस ने अपनी फ़ीस वसूल कर ली थी। इस कत्लेआम के दुर्दांत हत्यारों को आज तक सजा नहीं मिली। खुद ‘मि क्लीन’ राजीव गाँधी ने इसे सही ठहराया और यह सब हुआ था तत्कालीन गृहमंत्री और बाद में शासक और मध्य वर्ग के चहेते visionary ‘सुधारक’ नरसिम्हा राव की देख रेख में। हाँ, नानाजी देशमुख जैसों के नेतृत्व में संघ भी उस समय इस की हिमायत में खड़ा था।

कांग्रेसी शासन के पंजाब में भिंडरावाले, श्रीलंका में लिट्टे तथा मुंबई में शिवसेना को खड़ा करने, और नेल्ली, भागलपुर, मलियाना, हाशिमपुरा, मुरादाबाद, 1969-74 का बंगाल, आदि कत्लोगारत, नकली मुठभेड़ों, हर किसी पर देशद्रोह के आरोपों जैसे अन्य कितने ही भयानक दुष्कृत्यों ने आज की भयावह स्थिति के लिए जमीन तैयार करने में बड़ी भारी भूमिका निभाई है। यहाँ तक कि जिस नानावती नाम के जज को 1984 के जुर्म को रफादफा करने की जिम्मेदारी कांग्रेस ने दी थी, उसी को 2002 के बाद का ठेका मोदी ने भी दिया!

यह भी याद रहे कि 1980 में दोबारा सत्ता में आने के बाद इंदिरा गांधी संघ के साथ खड़ी थीं और विश्व हिंदू परिषद की एकात्मता यात्रा को झंडी उन्होंने ही दिखाई थी और बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि पर विहिप का तमाम वितंडा उस वक्त खड़ा हुआ जब इसके अध्यक्ष हमेशा के बड़े कांग्रेसी नेता, इंदिरा के विश्वासपात्र कर्ण सिंह थे| 1984 के चुनाव में भी संघ कांग्रेस के पीछे था, बीजेपी बस दो सीट पर सिमट गई थी| ये तो शाहबानो प्रकरण पर राजीव गांधी का रुख था जिससे संघ-कांग्रेस गठबंधन टूटा|

अगर कांग्रेस की उच्च संस्कृति जाननी हो तो बस एक बार सितम्बर 1984 में नागपुर के एनएसयूआई सम्मेलन का वर्णन पढ़ लें जिसमें इंदिरा और राजीव गांधी दोनों थे – पूरे शहर का क्या हाल था, नागपुर का रेडलाइट एरिया भी डर के मारे बंद हो गया था और खुद अपने ही संगठन की महिला प्रतिनिधियों के साथ वाला सलूक भी| एबीवीपी अभी उसके बराबर पहुंचने में शायद थोड़ा वक्त और लेगी!

इसीलिए जब कोई जनतंत्र, सेकुलरिज्म, संस्कृति, आदि के नाम पर कांग्रेस से कुछ करने की उम्मीद की बात करता है तो, माफ़ करें, पर मुझे उसमें भोलेपन या चालाकी के सिवा और कुछ नजर नहीं आता।
कांग्रेस ऐसे ही इतने लम्बे वक्त तक पूंजीपति वर्ग की सबसे भरोसेमंद पार्टी नहीं रही! और अब भी विकल्प में तो है ही!

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