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Generic Medicine : जेनेरिक दवाएं आज क्यों बेअसर हो गयी है

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आज इलाज के लिए दवाएँ, जाँच की विभिन्न तकनीकें व ऑपरेशन के विकसित तरीक़े मौजूद हैं। ला इलाज बीमारी को छोड़ दें, तो भी इलाजयोग बीमारियों की वजह से हर साल करोड़ों लोग मर रहे हैं। जैसे- इलाज और दवाओं के महँगा होना, सरकार द्वारा सही ढंग से स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया न करवाना व समय पर सही इलाज न मिलना। आज सस्ती जेनेरिक (Generic) दवाओं की बजाय महँगी ब्राण्डेड दवाओं को प्रोत्साहित किया जाता है इसलिए भी ग़रीब इलाज से दूर हो गए हैं। ऐसे में तमाम शोध के परिणामों के उलट कुछ डॉक्टर यह दलील देने लगे हैं कि सस्ती जेनेरिक (Generic) दवाएँ असर नहीं करतीं। तो ऐसे में यह लाज़मी सवाल है कि आकिर क्यों जेनेरिक दवाएँ बेअसर हो साइड इफ़ेक्ट पैदा करने लागी है जोकि नहीं होने चाहिए ?

रिपोर्ट – चंद वर्ष पहले पाकिस्तान में खाँसी की दवा पीने से 60 लोगों की मृत्यु हो गयी है जबकि पराग्वे के सामान घटी घटना में 44 बच्चों को अस्पताल में भर्ती करवाया जाता है। जब दवाओं की लेबोरेटरी में इसकी जांच हुई और विश्व स्वास्थ्य संगठन का डाटा-बेस खंगाला गया तो पता चला कि इन दवाओं में एक और साल्ट (लीवोमेथोर्फ़न) मौजूद था, जो मॉर्फि़न की तरह होता लेकिन उससे 5 गुना तेज़। यह कैंसर मरीजों को दिया जाता है और इसकी ज़्यादा मात्रा नुक़सानदेह होता है। साथ ही यह भी पता चला कि इस साल्ट का निर्याक देश भारत था। मान लीजिए कोई एण्टीबायोटिक दवा है, और उसमें एण्टीबायोटिक साल्ट के बजाय कोई और चीज़ मौजूद है या फिर साल्ट की ही मात्रा  कम कर दी गयी हो तो ज़ाहिर है, दवा बेअसर होगी। यही पाकिस्तान, पराग्वे व जेनेरिक दवाइयों के साथ हो रहा है।

ज्ञात हो कि हमारा देश आज जेनेरिक (Generic) दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक होने के साथ-साथ नक़ली दवाओं के कारोबार में भी अव्वल है। यहाँ से पूरी दुनिया में नक़ली दवाएँ भेजी जा रही हैं। रैनबैक्सी कंपनी को ग़लत डाटा उपलब्ध कराने के जुर्म में उसपर 500 मिलियन अमेरिकन डॉलर का जुर्माना लगाया गया था। जबकि 2014 में जर्मनी ने भारत की 80 दवाओं को इसी आधार पर प्रतिबंधित भी कर दिया था। इसपर भारत के मुख्य दवा नियन्त्रक यह बयान देकर किनारा कर लिए थे कि अमेरिका के मानकों पर अगर हम चलने लगे तो हमें सभी दवाएँ बंद कर देनी पड़ेंगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कम और मध्य आय वाले देशों में कम से कम 10 प्रतिशत घटिया गुणवत्ता वाली दवा चलन में है। ज़ाहिर है कि यह सारा खेल पूँजीपतियो के मुनाफ़े पर टिकी है और मोदी सरकार ठहरी पूंजीपतियो की चहेती, तो ऐसे में केसे मोदी सरकार इसपर कोई लगाम लगा सकती थी!

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