इतिहास के क्रूर पन्नों में हमारी सिसकियां गायब हैं: सूरज कुमार बौद्ध

इतिहास के क्रूर पन्नों में भीमा कोरेगांव युद्ध तथा खरसावां गोली कांड की शहादत : सूरज कुमार बौद्ध
जबकि पूरा विश्व नए साल के जश्न में डूबा हुआ है वहीं कुछ ऐसे घटनाएं भी हैं जो हमारे रगों में जोश और उद्गार की लहरें उत्पन्न करती हैं। हजारों सालों से इतिहास के पन्नों में मिटा दिया शोषित कौमों का इतिहास आज चीख चीखकर एक खुली किताब बनने की उधेड़बुन में संघर्ष कर रहा है। इतिहास के क्रूर पन्नों में हमारी सिसकियां गायब हैं। इसीलिए बाबा साहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर लिखते हैं कि भारत का इतिहास ब्राह्मणवाद (अर्थात जातीयता) तथा बौद्ध धम्म (अर्थात मानवता) के बीच संघर्षों का इतिहास है। हमारा वास्तविक इतिहास तो कभी लिखा ही नहीं गया है। हमारा एक साथी सही ही कहता है कि इतिहास वह नहीं जो हमने पढ़ा है या जो हमारे सिलेबस में इंगित किया गया है बल्कि असली इतिहास वह है जो हजारों सालों से धार्मिक चोला पहने आतंकवादियों द्वारा ढाहे गए जुल्मों को हमने झेला है, बर्दाश्त किया है मगर वह लिखा नहीं गया। आइए 01 जनवरी पर केंद्रित वंचितों के संघर्ष पर एक नजर डालते हैं…..

इतिहास के क्रूर पन्नों में भीमा कोरेगांव युद्ध….
01 जनवरी 1818 का भीमा कोरेगांव युद्ध जहां मात्र 500 महारों ने 28000 ब्राह्मण पेशवाओं को मात दी थी और उन्हें उन सभी का खात्मा करके कोरेगांव की सरजमीं को लाल लाल कर दिया था। यलगार ! हमें गर्व है इन योद्धाओं पर। आखिर अब हिंदूओं को यह बात समझ में आ चुकी थी कि शुद्र/अछूत समाज अगर अपने पर आ गया तो पूरे के पूरे 33 करोड़ देवी देवता देखते रह जाएंगे और शूद्र/अछूत समाज को अपना हक छीनने से कोई नहीं रोक सकता है। गणितीय आंकड़ों से देखें तो 28000/500 = 56 आता है। अर्थात एक एक एक योद्धाओं ने 56-56 को मारा था। तभी तो कहावत है कि ‘तेरे जैसे 56 देखे हैं।’ आज के शासकों को कौन बताए कि 56 इंची सीना वाला डायलॉग भी भीमा कोरेगांव युद्ध की देन है। बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर कलम के योद्धा थे, कलम के सिपाही थे लेकिन मान सम्मान स्वाभिमान को सर्वोपरि रखने वाले बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर कोरेगांव युद्ध मे शहादत को प्राप्त अमर वीर शहीदों के तलवारों को नमन कर श्रद्धांजलि अर्पित करने हेतु हर साल भीमा कोरेगांव शौर्य स्तंभ को जाया करते थे। हम भीमा कोरेगांव युद्ध में शहादत को प्राप्त सभी शहीदों को नमन करते हुए विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। शत शत नमन !

इतिहास के क्रूर पन्नों में खरसावां गोली कांड
वहीं हमारे संघर्षों से ही जुड़ी हुई 1-2 जनवरी 1948 को घटित एक दूसरी घटना है जिसे सुनकर हमारी आंखें भर जाएंगी। उस घटना का नाम है खरसावां गोली कांड। खरसावां नामक जगह पर अपनी जमीन का ओड़िसा राज्य में विलय का विरोध कर रहे बेबस लाचार आदिवासियों पर अपनी जातिगत मानसिकता ,संवादहीनता तथा धैर्यहीनता से ग्रस्त निर्दयी हुकूमत के आदेश पर पुलिसिया गुंडो ने हजारों आदिवासियों पर गोलियों का बौछार कर दिया जिसमें हजारों आदिवासी मारे गए। आज़ाद भारत के इतिहास में सवर्णनीत सरकार द्वारा ढाए गए जुल्मों में यह अब तक कि सबसे शर्मनाक हरकत है। हमें गर्व हैं बिरसा मुंडा की इस विरासत पर जो कि मौत को सामने देखते हुए भी मौत को मारने के लिए लड़ जाते हैं लेकिन झुकना पसंद नहीं करते हैं। आखिर झुकेंगे भी क्यों इस देश के आदिवासी मूलनिवासी जो ठहरे। “आदिवासी हैं रे, मूलनिवासी हैं रे… मर जाएंगे, मार जाएंगे पर अपनी जमीन नहीं देंगे।” आखिर में बिरसा मुंडा के नारा ‘अबुआ दिसुम-अबुआ राज’ तथा ‘उलगुलान’ की जय जयकार करते हुए खरसावां कांड में शहादत को प्राप्त सभी शहीदों को अपने भीगी आंखों को लिए शत शत नमन।
– सूरज कुमार बौद्ध (LL.M. 1st Year)

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