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अभाविप (ABVP) में आदिवासी छात्रों के होने के राजनीतिक मायने

अभाविप ( ABVP )

सरकार ने पारा शिक्षकों से सीधा कहा हड़ताल समाप्त किये बिना कोई बात नहीं होगी जैसे ख़बरों के बीच रांची विश्व विद्यालय छात्र संघ चुनाव में कुल 80 पदों के लिए चुनाव हुए जिसमे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के प्रत्यासियों ने 80 पदों में से 42 पदों में जीत कर सनसनी फैला दी है। दिलचस्प यह है कि कुल 16 अध्यक्ष पदों में 10 पदों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। क्या झारखण्ड के पृष्ठभूमि पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के छात्रों का चुनाव में जीत सामान्य बात है? इस जीत के राजनीतिक मायने भी निकले जा सकते हैं। समान्य राजनीति को समझने वाला भी बता सकता है कि अभाविप (ABVP) के छात्र नेता किस पार्टी की विचारधारा को मानने वाले है? साथ ही चुनावी दौर में यह मोर्चा किस पार्टी को मदद करती है और अभाविप (ABVP) के छात्र नेताओं का प्रमोशन किस राजनीतिक पार्टी में होता है?

इस चुनाव का मजेदार पक्ष यह है कि अभाविप (ABVP) के प्रत्यासियों के रूप में आदिवासी-मूलवासी छात्रों ने जीत हासिल की है। जबकि झारखण्ड में भाजपा की सरकार है जिसने संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम 1949 और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 को संशोधन करने का प्रयास किया लेकिन यहाँ की आवाम ने खासकर आदिवासियों ने जोरदार विरोध कर जैसे-तैसे सरकार की मंशा को नाकाम किया। इतना होने के बावजूद रघुवर सरकार ने भूमि बैंक बनाकर झारखंडी समुदाय के सामुदायिक जमीन को छिनने का कम कर रही है। जब इससे काम नहीं बना तो झारखण्ड भूमि अधिग्रहण 2018  को पारित कर आदिवासी और मूलनिवासियों की जमीनों को जबरन लुटने का कानून बनाया। साथ ही झारखण्ड का डोमिसाइल नीति भी गलत बना यहाँ के आदिवासी और मूलनिवासियों को रोजगार से वंचित किया। फिर भी झारखण्ड के आदिवासी-मूलवासी छात्र कैसे अभाविप के प्रत्यासी बने और जीते?

बहरहाल, इन आदिवासी छात्रों की भारी संख्या में जीत को हलके में कतई नहीं लिया जा सकता। आदिवासी-मूलवासी छात्रों का अभाविप (ABVP) से जुड़ाव के कई सथियों में एक यह हो सकता है कि इन आदिवासी छात्रों ने अज्ञानता में अभाविप (ABVP) की सदस्यता ली, या दूसरा यह कि वे अभाविप ( ABVP ) के विचारधारा को जानते हैं और उस विचारधारा से सहमत है। इसका तीसरा पक्ष या भी हो सकता है कि अभाविप ( ABVP ) के आदिवासी प्रत्यासी महत्वकांक्षी हो गए और उन्हें किसी भी विचारधारा से कोई फर्क नहीं पड़ता, चाहे वह विचारधारा आदिवासी विचारधारा के खिलाफ ही क्यों न हो।

आदिवासी विचारक रायमुल बान्डरा का मानना है कि अभाविप (ABVP) के अधिकतर प्रत्यासी सरना समुदाय से आते हैं। इस जीत में आदिवासी छात्रों की वैचारिक हार हुई है। इस जीत की राजनीतिक कीमत उन्हें व्यक्तिगत के साथ-साथ सामुदायिक तौर पर निकट भविष्य में चुकानी पड़ेगी।

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