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कडक चाय का मायना ही देश में अब बदल चुका है – jharkhandkhabar

कडक चाय

कडक चाय का मायना ही देश में अब बदल चुका है। सुब्हमण्य स्वामी जेटली को ही सबसे बडे अपराधी बता रहे हैं तो योगी कह रहे है कि मोदी तो कभी राम मंदिर बनाना ही नहीं चाहते। गडकरी इशारा करते है, कारपोरेट उनके पीछे खडा हो जाये तो वे मोदी रहित बीजेपी को सत्ता में एक बार फिर ला सकते है। संघ भी चिंतन कर रहा है कि जब जहाज डूबेगा तो उनकी साख कैसे बचेगी। इन हालातों के बीच कप्तान साहेब के पास लोकसभा चुनाव के साथ झारखंड, महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव करने के अलावे और कोई विकल्प बचता नहीं है।

क्योंकि मोदी जी ने शुरु से चाहा कि देश प्रेजिडेन्शियल इलेक्शन की तरफ बढ जाये जिसमें एक तरफ लोकप्रिय चेहरा मोदी होगें तो दूसरी तरफ पप्पू यानि राहुल गांधी। लेकिन धीरे धीरे हालात ऐसे पलट रहे हैं, जो प्रेसिडिनेशियल इलेक्शन का चेहरा था वह अब बीजेपी के नेताओ या कहे जेटली तक के निशाने पर है। बीजेपी जो सांगठनिक पार्टी है और संघ की जमीन बीजेपी को मजबूती देती है। लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी ने जिस प्रकार खुद को लारजर दैन संघ बनाने का प्रयास किया उसमें अगर वह हारेगें तो सिर्फ वह दोनों ही नहीं ढहेगें बल्कि बीजेपी और संघ की जमीन भी धंसेगी।

वही दूसरी तरफ काग्रेस का संगठन सभी जगह नहीं है, लेकिन तमाम क्षेतीय दलों का गोलबंद होने से धीरे धीरे विपक्ष का कद साख के साथ बढता जा रहा है। और चाहे अनचाहे प्रसिडेन्शियल उम्मीदवार की दौड़ में मोदी जी फीके पड़ते जा रहे हैं। साथ ही प्रियांका गांधी के मैदान में उतरने से प्रसेडेशियल इलेक्शन को एक अलग आयाम मिल जायेगा।

मसलन, ऐसी स्थिति में बीजेपी को अपनी रणनीति बदल कर प्लान बी (कडक चाय से फीकी चाय ) की ओर मुड़ना आवश्यक हो गया है। और …जब बीजेपी का मतलब ही मोदी हो तब रणनीति कौन बदलेगा जिसकी शुरुआत झारखंड, महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव को लोकसभा के साथ कराने के घोश्ने के रूप में हो चुका है। वैसे भी साहब को जो बताया जा रहा है वह उसे ही सच मान रहे है और बताने वाले झूठ क्यो बोले जब साहेब को केवल जीत ही सुननी हो। साथ ही अबके तमाम भाषणो में अब सपने नहीं दिखाये जा रहे बल्कि गठबंधन को जमकर कोसा जा है और कोसने का अंदाज एसा है जिससे उन्हें लगता है की सहानुभूति के वोट तो उन्हें जरूर मिल जायेंगे …

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