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युद्ध की ज़रूरत

युद्ध की ज़रूरत जितनी मोदी को है उतनी ही इमरान खान को भी

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युद्ध की ज़रूरत फासीवादी सरकारों को क्यों 

आज सीमित युद्ध की ज़रूरत जितनी भाजपा-मोदी को है उतनी ही इमरान खान को भी है। उसके पॉपुलिस्ट नारों की भी हवा मोदी के जुमलों की तरह चन्द महीनों में ही निकल गयी है। आवाम अब उसे सेना की कठपुतली समझती है। भारत की ही तरह आज पाकिस्तानी अर्थतंत्र भी गंभीर संकट का शिकार हो चुका है! इसलिए दोनों देशों के शासक इनके दोस्त पूंजीपति वर्ग युद्धोन्माद पैदा कर दोनों ही देशों की जनता को आपस में उलझा कर चुनावी फसल का लाभ लेना चाहते हैं। साथ ही युद्ध उद्योग से अपार मुनाफ़ा कूटकर अपने डूबती नैया को पार भी लगाना चाहते हैं, भले ही युद्ध का बोझ उठाने में आम जनता की कमर ही क्यों न टूट जाए।

भारतीय उपमहाद्वीप में तनाव और युद्ध की स्थिति वर्तमान में यहाँ के साम्राज्यवादियों की ज़रूरत है। अमेरिका और यूरोप के देश जिस दीर्घकालिक, असाध्य भयंकर मंदी को झेल रहे हैं, उसमें हथियारों की बिक्री से उन्हें कुछ राहत की साँस मिलेगी। ज्ञात हो कि भारत, पाकिस्तान और सऊदी अरब ही पश्चिमी देशों के हथियारों के सबसे बड़े ख़रीदार हैं।

विशेषकर मध्यवर्गीय जनता के भीतर युद्धोन्मादी देशभक्ति का उभार हमेशा  ही सत्ताधारियों को संकटों के भँवर से उबारता रहा है। पुलवामा की घटना के बाद भारत द्वारा आतंकी ठिकानों पर बमबारी के बाद अब देश के अनेक ज्वलंत मुद्दे, रिकॉर्डतोड़ बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, रफ़ाल घोटाला सहित दर्ज़नों घपले-घोटाले, जी.एस.टी. नोटबंदी के झूठे दावों का भंडाफोड़, 10 लाख आदिवासियों को उजाड़े जाने का तुगलकी फरमान, किसानों की तबाही और आन्दोलन आदि-आदि सभी हवा हो जायेंगे या हो भी गए हैं।

मीडिया लगातार ‘बदला-बदला’ का शोर तो मचा ही रहा है, और अपने इस शोर के तले मोदी सरकार द्वारा अदानी को 50 वर्षों के लिए देश के पाँच एअरपोर्ट सौंप देने वाली ख़बर आसानी से दबा दिए गए। आज इस ख़बर से मीडिया को कोई लेना देना नहीं है। हमले का हवाला देकर मोदी, अमित शाह समेत कई भाजपा नेता व उनके भक्तजन भाजपा के लिए लगातार वोट माँगना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान पर हमला तो ठीक है परन्तु इसके आड़ में भक्तों द्वारा यह नारा लगाया जाना कि हमें नौकरी नहीं बदला चाहिए’, ‘भूखों रह लेंगे पर मोदीजी, बदला लो’, ‘आम चुनाव रोक दो, पाकिस्तान को ठोंक दो’ … से क्या साबित होता है। विडंबना यह है कि उन्मादी अंधराष्ट्रवाद एक ऐसी घुट्टी होती है, जिसे पीने के बाद लोगों को तबतक कुछ भी दिखाई नहीं देता जबतक चिड़िया खेत न चुग ले।

बहरहाल, आज के उन्मादी माहौल में हमें एकजुट होकर साहसपूर्वक युद्धपिपासु-खूनी अंधराष्ट्रवादी जुनून को थामने का प्रयास करना चाहिए और लोगों को बार-बार याद दिलाते रहना चाहिए कि भारत की जनता की लम्बी लड़ाई इस फासीवादी सरकार और उसके चहेते पूँजीपतियों से है, ठीक उसी तरह जैसे पाकिस्तान की जनता की असली लड़ाई एक निरंकुश पूँजीवादी सत्ता और भ्रष्ट-पतित-ज़ालिम सैन्य तंत्र से है। हमें हर वह मुमकिन कोशिश करनी होगी जिससे फासीवादी ताकतें, आम जनता का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाने की साज़िश में कभी सफल न हो सके ।

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