घरेलू मज़दूरों को आखिर न्याय कब देगी यह सरकार

सोशल अलर्ट की 2008 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में घरेलू मज़दूरों की कुल संख्या 10 करोड़ के क़रीब थी। जो कि बढ़ते शहरीकरण के वजह से अबतक लगभग तीगुनी हो गयी होगी। इसमें अधिक संख्या औरतों की है, साथ ही निसंदेह लाखों बच्चे भी शामिल हैं। जाहिर है चूँकि झारखंड अति पिछड़ा राज्य है तो यह संख्या यहाँ भी बड़ी मात्रा में होगी। विडंबना यह है कि “घरेलू नौकर” कहे जाने वाले इन घरेलु मज़दूरों को भारतीय क़ानून मज़दूर तक नहीं मानता।

इन घरेलू मज़दूरों पर ठेका क़ानून भी लागू नहीं होता। जिसका सीधा मतलब यह है कि अमीरों के घरों में झाड़ू-पोछा, खाना बनाने, कपड़े धोने, बच्चों को संभालने, पैर दबाने-मालिश करने, बग़ीचों की देखभाल, घरों की बड़ी संख्या में छोटे-मोटे काम करने वाले इन मज़दूरों के लिए क़ानून में न तो काम के घण्टे तय हैं और न ही कोई न्यूनतम वेतन। इनके काम के घंटे व वेतन दोनों ही मालिकों के रहमोकरम पर निर्भर करता है।

इन मज़दूरों को अंदर ही रहने को छोटा-मोटा कमरा दे दिया जाता है या फिर काम-चलाऊ जगह बना दी जाती है। जो अधिकांश अपने परिवार के साथ भी रहते हैं। इन मज़दूरों से तो रोज़ाना 14-18 घंटे तक काम लिया जाता है, इनके परिवार के सदस्यों, यहाँ तक कि इनके बच्चों से भी आने-बहाने काम लिया जाता है। इन घरेलू मज़दूरों के केवल श्रम ही नहीं लूटे जाते बल्कि इन्हें बुरे व्यवहार तक का सामना भी करना पड़ता है। इन्हें जहां गाली-गलोच, मार पीट के अलावा जाति, क्षेत्र, धर्म आधारित भेद-भाव का सामना करना पड़ता है तो वहीं घरेलू स्त्री मज़दूरों को शारीरिक शोषण का भी सामना करना पड़ता है।

अलबत्ता, नाज़िम सवाल यह है कि इन घरेलू मज़दूरों की दुर्दशा में सुधार कैसे हो सकता है? मौजूदा सरकार तो इनकी इनकी ओर आँख मूँद कर खड़ी है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर मौजूदा सरकार जो खुद को ग़रीबों की सरकार मानती है, 2008 से संसद में लटके घरेलू मज़दूर बिल की कमियों को दूर कर अब तक पारित क्यों नहीं किया है। मसलन,  बेशक इन मज़दूरों को इन विषम परिस्थितियों में सुधार के लिए जागरूक एवं संगठित हो संघर्ष की राह चलना ज़रूरी है।

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