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मौजूदा सत्ता के बूट (जूते) भारतीय संविधान से भी मजबूत

सत्ता के बूट

क्या मौजूदा सत्ता के बूट (जूते) भारतीय संविधान से भी ज्यादा मजबूत हैं 

विकास के नाम पर भारत में आज नैतिकता के पतन की जो बेचैनी वर्तमान सत्ता में देखी जा रही है यकीनन ऐतिहासिक है और हिंदुस्तान के गरिमा को कलंकित करती है कहते हैं कि राजनीति में सत्ता जब सर चढ़ जाता है तो वह दीवानगी में बेचैन हो सारी नैसर्गिक व्यवस्था को स्वतः ही खत्म कर एक अंत की और अग्रसर हो जाता हैऔर अपने इस अंत के सफर में कई लक्षण जैसे सत्ताधारियों में सत्ता की भूख का कई गुना बढ़ जाना, अव्यवस्थित और अतार्किक हो जाना, अपने ही महकमे में खुद को सबसे ऊपर की पंक्ति में स्थापित करने के क्रम में नीचता के किसी भी हद से गुजरने में  गुरेज न  करना,  प्रतिबिंबित करते जाते हैं। और वर्तमान सत्ताधारियों में जो सत्ता की भूख देखी जा रही है निस्संदेह ऐसी भूख भारत में पहले शायद ही कभी देखी गयी हो।

वैसे भी मौजूदा सत्ता में ही पूरे देश भर में शूट-बूट की परम्परा का आरम्भ हुआ है। शूट का स्वाद तो केवल बड़े साहब ने चखे लेकिन बूट का स्वाद  तो अबतक केवल भाजपा के ही रघुबर दास सरीखे नेताओं ने ही चखे थे। परन्तु बुधवार को आम चुनाव से ठीक पहले ऑन कैमरा, फाग के इस माह में उत्तरप्रदेश के संत कबीर नगर मे, सत्ताधीशों ने जो एक दूसरे पर गुलाल के जगह बूटों (जूते) की होली खेली, निश्चित ही भारत की छवि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल की है। हालांकि रवीश ने पहले ही पत्रकारों की और से बूटों (जूतों) का माप और ब्रांड न बता पाने की स्थिति में  माफ़ी मांग चुके है।

बहरहाल, बीजेपी सांसद शरद त्रिपाठी ने अपने ही दल के विधायक राकेश सिंह बघेल को केवल एक योजना-शिलापट में उनका नाम अंकित न होने की स्थिति में जिस प्रकार जूतों से पीटना और साथ में यह कहना कि आपके जैसे विधायक हमने कई पैदा किए हैं, निश्चित तौर पर यह बताता है कि भाजपा संविधान और उसमे अंकित अक्षरों को खेल समझती है। हालांकि बचाव में विधायक बघेल ने भी हाथों से सांसद शरद त्रिपाठी को मारने का प्रयास किया मगर सासंद त्रिपाठी की तरह वे बदला न ले पाए

मसलन, ऑन कैमरा हुई इस मारपीट से भाजपा नेतृत्व भारत की गरिमा को को लेकर सकते में नहीं दिख रहे, बल्कि शीर्ष नेतृत्व इस बात से सकते में है कि कहीं हालात जल्द न संभले तो यह मामला पूर्वी उत्तर प्रदेश में ठाकुर बनाम ब्राह्मण का रूप ले लेगी। यही कारण है कि केंद्रीय नेतृत्व इनकी सदस्यता रद्द करने के बजाय राज्य सरकार व राज्य संगठन को हर हाल में इस विवाद का निपटारा करने का सख्त निर्देश दिया है। यदि ये भाजपा के बजाय किसी अन्य दल के विधायक-सांसद होते तो अबतक सत्ता ने ईट से ईट बजा दी होती। इसलिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं हो सकता कि मौजूदा वक़्त में सत्ता के बूट संविधान से भी मजबूत है।  

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