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चुनाव की उड़ान :  उदय मोहन पाठक (संपादक)

चुनाव

देश का सबसे बड़ा त्योहार चुनाव आ चुका है। लोग चुनाव परिचर्चा में जुड़ गए हैं। ये परिचर्चा फाग की मस्ती की तरह है। कहीं रंग भरी परिचर्चा है, तो कहीं कीचड़ से सनी हुई। होली में ऐसा प्रतीत हुआ कि सभी नेतागण पूरी तरह से होली के मूड में आ गए थे। आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। एक तरफ  सीटों के बंटवारे का कार्यक्रम चल रहा है, तो दूसरी तरफ विभिन्न दलों के नेतागण जनता को रिझाने के लिए नये-नये लोकलुभावन नारों का इजाद करते दिखे।

देश को संकट से उबारने हेतु एक नेता गंगा यात्रा पर निकल पड़े है तो दूसरी तरफ, मैं चौकीदार हूँ, मिशन मे एक दल के नेता गण बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे है। किसी बिमार नेता का हाल किसी नेता ने पूछ लिया तो दूसरे नेता को सरदर्द होने लगता है। चुनाव के सन्दर्भ में मीडिया भी अनेक कार्यक्रम दिखा रहे हैं। उस कार्यक्रम के ऐंकर सवाल कुछ करते है लेकिन नेतागण जवाब में बात को कहां से कहां ले जाते है। वहां बैठे लोगो को कुछ भी समझ में नही आता केवल मनोरंजन कर चले जाते। बस, केवल आरोप प्रत्यारोप।

मेरी समझ से परे है कि आखिर यह नेता गण इतने मस्ती मे यकायक कैसे आ गये? जनता को भी यह समझ मे नही आ रहा है कि सही कौन है, चुनाव मे सरकार के क्षेत्र विशेष मे असफलता पर चर्चा होनी चाहिए, मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिए, सत्ता पक्ष द्वारा पूरी नहीं कि गयी वादों के संदर्भ में चर्चा की जानी चाहिए, लेकिन यहां तो व्यक्ति विशेष के कामों की चर्चा होती दिख रही है, आलोचना हो रही है। क्या ये परिचर्चा फाग की मस्ती जैसी नही है? जनता यह देखती है कि हमारे सांसद या विधायक क्षेत्र के विकास के लिए कितना परिश्रम किया। सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारा तभी यह निर्णय लेती है कि वह एक सच्चा आदमी है, अन्यथा कसमे वादे प्यार, वफा, सब बाते है, बातों का क्या?

माना लो, हमारे क्षेत्र के सभी नेता गण सच्चे है, अच्छे है, लेकिन चुनना तो किसी एक को है, जो जनता की नजर मे सबसे सच्चे है, सबसे अच्छे है। इसलिए एक बड़े संत का कथन उठो, जागो और श्रेष्ठता को प्राप्त करो, प्रमाणित करने का वक्त आ गया है। मन की शांति के लिए आप तीर्थाटन कभी भी कर सकते है लेकिन चुनाव जीतने के लिए जनता के बीच जाना चाहिए। पांच वर्ष मे कम से कम एक बार ही सही, जाना तो चाहिए ही क्योंकि जनता ही फैसला लेगी, किसे सरकार बनाने का अवसर देना चाहिए।

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