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मैं सुखी हूँ

मैं सुखी हूँ  – (व्यंग्य ) – @उदय मोहन पाठक

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मैं सुखी हूँ  -(व्यंग्य )

विवाह से पूर्व मैं छात्र जीवन के सुख का आनंद ले रहा था। स्वयं भोजन पकाना, कपड़े धोना, झाड़ू लगाना आदि आदि कार्यों के अतिरिक्त स्वाध्याय में लगा रहता था। प्रत्येक माह पिताजी के मनी ऑर्डर की चिंता रहती थी। किसी तरह पढ़ लिख कर अधिवक्ता बन गया। पिताजी ने पल्ला झाड़ लिया। कमाने की चिंता दिन रात सताने लगी। उधर मेरे माता पिता को मेरे विवाह की चिंता सताने लगी। कुछ कमाता था तो दाल रोटी की चिंता। धीरे धीरे अभाव में रहने का स्वभाव बन गया। पिताजी ने मेरा विवाह निश्चित कर दिया। मुझे नीयत तिथि को बारात जाने का आदेश दे दिया। मैं भी नया वस्त्र पहनकर दूल्हा बना और शादी करने चल दिया। एक मृगनयनी अप्सरा से मेरा विवाह हो गया जिसे अपने रूप पर असीम अहंकार था। उसने मुझे अपना निजी कर्मचारी समझ लिया। मैं जी हजूरी करते हुए जीवन बिता रहा था। @मैं सुखी हूँ 

इसी बीच बच्चों का आगमन शुरू हो गया। घर बच्चों की किलकारीयों से गूँजने लगा। नाते रिश्तेदारों का जमावड़ा होने लगा। सुबह से शाम तक मैं उन लोगों की सेवा में लगा रहता था। कचहरी के काम के अलावे गृह कार्य भी बढ़ने लगा। बच्चे बड़े होने लगे। उनकी फरमाइशें  बढ़ने लगी। मैं खुशी-खुशी अर्था भाव में भी सबकी जरूरतों को पूरा करता रहा। बच्चों की पढ़ाई का खर्च बढ़ने लगा। जरूरतों को पूरा करने के लिए मैं अहर्निश काम करने लगा। धीरे धीरे स्वास्थ्य गिरने लगा। घर वालों को मेरे स्वास्थ्य की चिंता सताने लगी। कमायेगा कौन? मैंने एक विद्वान के कथन को आत्मसात कर लिया- कार्यंसाधयामि वा शरीरं पातयामि  क्योंकि मानव जीवन में ही सारा सुख है, उसका उपभोग कर लेना चाहिए। इस महंगाई में “अतिथि देवोभव” को भूल नहीं पाया क्योंकि यह मध्यमवर्गीय संस्कार है। किसी भी त्योहार को मन कर्म वचन से मनाना भी भारतीय परंपरा है क्योंकि आदमी के जीवन में खुश होने या सुखी होने के अवसर बहुत कम ही मिलते हैं। सगे संबंधियों के यहां निमंत्रण में जाना, महंगे उपहार देना, यही तो मानव जीवन है। यह अविराम चलता रहा।

अब अपनी जिम्मेदारी निभाने का समय आ गया। लड़कियों के विवाह के लिए वर चयन हेतु यात्रा करना लड़के वालों के जायज़ नाजायज मांगों को सुनना, अपनी प्रसन्नता दिखाते हुए हामी भरना, यह हमारे अच्छे संस्कार का प्रतीक है। लड़के वाले एक सफल व्यापारी की तरह अपने लड़के पर किए खर्चे को निर्धारित करते हैं। कन्या दान कर पिता का कन्या दान हेतू लिए गए कर्ज को चुकाने हेतु पुनः अहर्निश धन उपार्जन में लग जाते हैं। साथ ही अपनी उपलब्धियों पर खुश होते हैं कि चलो मैंने अपनी ज़िम्मेदारी पूर्ण कर ली। मध्यमवर्ग को कोई मारता नहीं है बल्कि अपनी ओछी शान, सामाजिक परंपरा, मान मर्यादा को निभाने में तिल- तिल कर मरता है। दुख में सुख ढूँढता रहता है। रूदन में खुशी ढूँढता रहता है। सुख क्या है? यह मध्यम- वर्गीय परिवार में आज तक अपरिभाषित है। महात्मा बुद्ध तो सर्वं दुखम्- दुखम कहते हुए शांति की खोज में घर-द्वार, पत्नी-पुत्र, छोड़ कर चले गए। उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार भी हुआ। लेकिन मैं —-जहां हूं खुश हूं, मस्त हूं, जिंदगी यही है, यही सोच कर मैं सुखी हूँ। @मैं सुखी हूँ  –(व्यंग्य ) उदय मोहन पाठक

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