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ज्योतिराव फुले-स्त्री मुक्ति व जाति उन्मूलन आन्दोलन के मजबूत योद्धा

ज्योतिराव फुले

ज्योतिराव फुले – स्त्री मुक्ति के पक्षधर व जाति उन्मूलन आन्दोलन के मजबूत योद्धा को उनके जन्‍मदिवस पर नमन, जिन्होंने मानवता को पुनर्जीवित करने के लिए अपना तमाम जीवन समर्पित कर दिया। लगभग 170 वर्ष पहले फुले ने बालिकाओं के लिए पहला विद्यालय खोलने का निर्णय लिया था। विधवा विवाह का समर्थन, विधवाओं के बाल कटने से रोकने के लिए नाइयों की हड़ताल, बाल विवाह का निषेध, विधवाओं के बच्चों का पालन-पोषण -ऐसे अनेक क़दमों से ज्योतिराव-सावित्रीबाई का स्त्री समानता, स्त्री स्वतन्त्रता का दृष्टिकोण उद्घाटित होता है।

यह सर्वविदित है कि, स्त्री मुक्ति व जाति उन्मूलन दोनों आपस में गुँथे हुए हैं। स्त्री तभी सच्चे मायनों में स्वतन्त्र हो सकेगी जब जाति रूपी काला सोच समाज से ख़त्म होगी। सामाजिक परिर्वतन के लिए ज्योतिराव फुले सरकार की बाट नहीं जोहते रहे। उपलब्ध साधनों से उन्होंने अपने संघर्ष की शुरुआत की। सामाजिक सवालों पर भी फुले शेटजी (व्यापारी) व भटजी (पुजारी) दोनों को दुश्मन के रूप में चिह्न‍ित करते थे। जीवन के उत्तरार्ध में वे ब्रिटिश शासन व भारतीय ब्राह्मणवादियों के गँठजोड़ को भली भांति समझ चुके थे। और उन्होंने भारतीय समाज को इनसे बचाने के बिना सरकार के बाट जोहे खुद ही एक बुद्धिजीवी के भांति उनपर मजबूत प्रहार करते रहे।  

आज जब संघी फासीवादी जातिप्रथा व पितृसत्ता के आधार पर व साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से दलितों, स्त्रियों व अल्पसंख्यकों पर तीव्र हमले कर रहे हैं, खाने-पीने-जीवनसाथी चुनने व प्रेम के अधिकार को भी छीनने की कोशिश कर रहे हैं, तब फुले को याद करने का विशेष औचित्य हो जाता है। साथ ही विशेष औचित्य यह भीहो जाता है कि हम उनके राहों पर चलते हुए मौजूदा सरकार जिसका हिन्दुस्तानी समाज से सरोकार बिलकुल ख़त्म हो चूका है, को उखाड़ फेंके। क्योंकि बिना ऐसा किये न तो उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है और न ही उनके सपनों का समाज ही बनाया जा सकता है।

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