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विकास दिखना चाहिए (खरी-खरी) -उदय मोहन पाठक

विकास

चाहे परिस्थितियां जो भी हों, विकास स्वप्न के बजाय धरातल पर दिखना चाहिए। गर्मी का मौसम, बिजली और पानी की समस्या से परेशान लोग। दोनो के पीछे के कारण पानी की कमी है – जैसे डेमो और बड़े जलाशयों में पानी की कमी। बिजली कैसे पैदा हो? जलापूर्ति कैसे हो? डीप बोरिंग के चलते कूपों में जल नही, चापानल में भी पानी नही। कुछ लोग आबाद कुछ लोग परेशान। आखिर इसकी व्यवस्था करेगा कौन? पोस्टरों में अनेक श्लोगन – जल ही जीवन है, जल बचाओ जीवन बचाओ, बरसात के जल को संरक्षित करो आदि-आदि। क्या इन श्लोगनो पर सच्चे मन से काम हो रहा है? यदि झारखंड के बरसाती नदियों पर जगह-जगह छिलका बांध बना दिया जाये तो संभवत: जलसंचय हो सकेगा। जिससे पृथ्वी का जल स्तर भी बढ़ेगा और नदियों के किनारे गर्मी में फसल भी लहलहायेगी। केवल पोस्टरवाजी से कुछ नही हो सकता।

         जंगलों के क्षरण प्रकृति के मिज़ाज को बिगाड़ रहा है, प्रदूषण बढ़ रहा है, जमीन बंजर हो रहा है। सरकार विज्ञापनों में तो प्रयास करती दिखती है लेकिन फिर भी सुरक्षा के अभाव में जंगल नष्ट हो रहे हैं। जंगली फल, मूल, जड़ी-बूटी लुप्त होती जा रही है। इसके जिम्मेदार तो हम भी है लेकिन इनकी सुरक्षा की व्यवस्था करेगा कौन? यह विकास के नही, विनाश के लक्षण हैं। 

           शिक्षा को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है, जिसके तहत 6 साल से 14 साल के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य  शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है लेकिन सरकारी विधालयों में शिक्षकों की कमी। सरकार द्वारा विधालयों की संख्या में कमी किया जाना। जनसंख्या बढ़ रही है और विधालयों की कमी और शिक्षकों की कमी इस मौलिक अधिकार को कितना फलदायी बना सकता है अपने आप में सवाल हैं। धीरे-धीरे प्राथमिक व मध्य विद्यालय मिड डे मील संस्थान बनता जा रहा है। शिक्षक बच्चे को दोपहर के भोजन की व्यवस्था करे या शिक्षा दे क्योंकि हमारे देश में प्रसारित सरकारी आंकड़ों के अनुसार शिक्षकों की भारी कमी है।

लोक स्वास्थ्य रक्षा के लिए कई योजनायें बनती हैं। सरकारी अस्पतालों में निशुल्क डाक्टर, दवाईयां, शल्य क्रिया, परिवार कल्याण योजनायें की व्यवस्था की गई है। लेकिन सम्यक देखरेख, और सुदृढ़ व्यवस्था के अभाव में सरकारी अस्पताल स्वतः बीमार प्रतीत होता है। इसलिए निजी अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है। राज्य की गरीब जनता कर्ज लेकर इलाज़ करा रही है। क्या करे? पीड़ा तो असहनीय है।

यदि सरकार का ध्यान लोक जीवन की मूल आवश्यकताओं के बजाय केवल संवाद पर रहता है तो ऐसी स्थिति में कोई भी राज्य से विकास से कोसों दूर रहेगा ही। नई तकनीक के ज्ञान के अभाव मे उलझा सारा विभाग, लिंक फेल की समस्या, बेलगाम अफसरशाही, ट्रैफ़िक जाम से परेशान लोग, बढ़ती महँगाई, रोजी-रोटी की खोज में भटकता बेरोज़गार युवा, मज़दूरों का पलायन, उच्च शिक्षण संस्थानों की कमी, आधुनिक सुविधाओं से लैश अस्पतालों की कमी क्या विकास का मापदंड में नही आते। थोड़ा भी ध्यान दिया जाए तो विकास ज़रूर दिखने लगेगा। तभी हम यह कह पायेंगे – ”सर्वे भवन्तु सुखिन्, सर्वे सन्तु निरामया”

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