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एतिहासिक समाचार

हम अपनी पुराकथाओं को भी अपना प्राचीन इतिहास ही मानते हैं; किंतु विद्वानों का एक वर्ग विदेशी सिद्धांतों के अनुसार उसे ‘मिथ’ अथवा ‘मिथ्या’ ही मानना चाहता है। अत: वह उसे अपना इतिहास नहीं मानता। परिणामत: पौराणिक उपन्यासों की, ऐतिहासिक उपन्यासों से एक पृथक् श्रेणी बन गई है। पुराकथाओं को अपना इतिहास मानते हुए भी मैं चाहूँगा कि पौराणिक उपन्यासों का वर्ग ऐतिहासिक उपन्यासों से पृथक् ही रहे। कारण ?

पौराणिक उपन्यास केवल एक काल विशेष की घटनाएँ ही नहीं हैं, उनकी अपनी एक मूल्य-व्यवस्था है। वे उपनिषदों के मूल्यों को चरित्रों के माध्यम से उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। जो उपन्यास पौराणिक काल, घटनाओं और चरित्रों पर आधृत तो हैं, किंतु उस मूल्य-व्यवस्था का अनुमोदन नहीं करते, उन्हें पौराणिक उपन्यास कहना उचित नहीं है। उनमें से अधिकांश तो पौराणिक मूल्य-व्यवस्था से अपरिचित अथवा उनके विरोधी लोगों द्वारा उन्हें ध्वस्त करने के लिए ही लिखे गए हैं।