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मोदी युग में जीवनस्तर में वृधि के पैमाने के हर स्तर पर देश पिछड़ा

मोदी युग अर्थव्यवस्था

मोदी सरकार का एजेण्डा बिल्कुल साफ़ है कि लोग आपस में बँटकर लड़ते-मरते रहें और वे अपने पूँजीपति मालिकों की तिजोरियाँ भरते रहें।

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 रांची का सुसाइड !

सुसाइड उस बच्चे ने नहीं किया। मर गया पुलिस का महकमा! इनके गंदे लाश गमकते हैं।  यही कारण है कि दारोगा या इससे ऊपर का कोई पुलिस वाला कभी मारा जाता है, तो जनता की सच्ची सहानुभूति शायद ही उन्हें मिल पाती है।             पुलिस …

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हरिशंकर परसाई की कलम से – शर्म की बात पर ताली पीटना

मैं आजकल बड़ी मुसीबत में हूं।मुझे भाषण के लिए अक्सर बुलाया जाता है। विषय यही होते हैं- देश का भविष्य, छात्र समस्या, युवा-असंतोष, भारतीय संस्कृति भी(हालांकि निमंत्रण की चिट्ठी में ‘संस्कृति’ अक्सर गलत लिखा होता है), पर मैं जानता हूं जिस देश में हिंदी-हिंसा आंदोलन भी जोरदार होता है, वहां …

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बच्ची गोद लेने पर सनी लियोन को गाली देने वाले लोग मनुवादी हैं: सूरज कुमार बौद्ध

पुरुषवादी समाज महिलाओं के प्रति अपनी संकुचित मानसिकता को बदलने का नाम नहीं ले रहा। महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाना तथा उनकी आजादी पर पाबंदी पुरुषवादी समाज का प्रमुख अंश है। अब सवाल यह होता है कि समाज कब मानेगा कि एक औरत को वेश्या बनने पर …

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घरेलु कामगार – नयी सदी के गुलाम

1931 की जनगणना के अनुसार देश में 27 लाख घरेलू कामगार थे, अधिकाँश पुरुष| स्वतंत्रता के पश्चात् साहबी कम हुई, जमींदारों की बेगार बंद हुई और विस्तार लेती पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में नई सरकारी-निजी नौकरियाँ आईं तो 1971 में यह तादाद घटकर 67 हजार रह गई| उसके बाद 80 के दशक …

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भारत की न्यायपालिका पर 400 परिवारों का ही कब्जा

कोलेजियम सिस्टम से जजों के रिश्तेदार ही बनते रहे हैं जज, जो अत्यन्त विचारणीय है | भारत के मा0 सर्वोच्च न्यायालय व मा0 उच्च न्यायालय में मात्र 400 परिवारों का ही कब्जा है और जो जज है उन्हीं के ही बेटा, बेटी, जीजा, साला, नातेदार, रिश्तेदार ही जज बनते आ …

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चाइनीज सामान के बहिष्कार के पीछे छिपी हुई तुच्छ  राजनीतिक मंशा- सूरज कुमार बौद्ध

चीनी सामान का बहिष्कार करो, चीनी झालर का बहिष्कार करो, मिट्टी वाले दिया जलाओ, स्वदेशी अपनाओ विदेशी भगाओ……. आदि। पिछले कुछ सालों से इस तरह की राजनीति खूब चमकाई जा रही है। जैसे दीपावली आती है तो कुछ चीनी झालर का विरोध करने लगेंगे, होली के आते ही चीनी रंगों …

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इतने पैसों में जाने कितने गरीबों का पेट भर जाता ???

किसी महंगी कार, ऑडी, बी.एम.डब्ल्यू. जैसी को देखते ही, “इतने पैसों में जाने कितने गरीबों का पेट भर जाता”, कह कर ताना देना कोई नयी बात तो नहीं है | साम्यवादियों-समाजवादियों के मूंह से कभी ना कभी सुना ही होगा | सवाल है कि कैसे खिलाते गरीबों को ? उन …

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गुड्स एंड सर्विस टैक्स (GST)

कौटिल्य की अमूल्य रचना अर्थशास्त्र के अनुसार, कर ऐसा हो कि व्यापार और उद्यम पर अंकुश न लगे, वाणिज्य में सुगमता हो और कर दो बार न लगे। कौटिल्य ने चेतावनी दी थी कि यदि इन सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ, तो व्यापारी दूसरे राज्यों में चले जाएंगे। वैश्वीकरण के …

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गीद्ध रूपी नेताओं से बचें

एक दिन एक गीद्ध के बच्चे ने गीद्ध से कहा कि हमने लगभग हर चार पैर वाले जीव का माँस खाया है, मगर आजतक दो पैर पर चलने वाले जीव का माँस नहीं खाया है.. पापा कैसा होता है इंसानों का माँस? गीद्ध ने कहा मैंने जीवन में तीन बार …

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हम भी तो बनें स्मार्ट (हिन्दुस्तान)

सरकार सभी शहरों के समग्र विकास की योजना के मकसद से शुरू की गई स्मार्ट सिटी की कल्पना में एक कदम और आगे बढ़ी। स्मार्ट शहरों की एक और सूची जारी हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, झांसी और अलीगढ़ के साथ बिहार के पटना और मुजफ्फरपुर और उत्तराखंड की …

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लोकतंत्र का कमाल 

इसे लोकतंत्र का कमाल ही मानना चाहिए कि हजारों साल से हाशिये पर रहे दलित समुदाय का दूसरा सदस्य उसी भारत की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने जा रहा है। और अगर भाजपा की तरफ से घोषित राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को कोई चुनौती मिलेगी भी तो लगभग …

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भाजपा का दाव

कल तक बिहार के राज्यपाल रहे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए राजग का उम्मीदवार बना कर भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक लक्ष्य है 2019 का लोकसभा चुनाव। और दूसरा लक्ष्य है विपक्ष को एकजुट न होने देना। कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार …

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संघर्ष के दौरान यौन हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीयदिवस: 19 जून

19 जून 2017 को संघर्ष के दौरान यौन हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस विश्व स्तर पर मनाया गया। वर्ष 2017 के लिए इस दिवस का विषय “न्याय एवं निवारण के माध्यम से यौन हिंसा के अपराधों को रोकना” (प्रेवेंटिंग सेक्सुअल वायलेंस क्राइम्स थ्रू जस्टिस एंड डेटेरेन्स) था। इस …

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रोजगार पैदा करने वाला हो एफडीआई (पत्रिका)

भारत की अर्थव्यवस्था में एक अनोखा अंतर्विरोध दिखाई दे रहा है। बीते कुछ दशकों में, खास तौर से विकासशील देशों में यह पाया गया है कि मेक्रो इकॉनोमिक्स में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिए रामबाण है। ज्यादा एफडीआई आने का मतलब देश की आर्थिक नीतियों की स्वीकार्यता के साथ […]

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