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कविता

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कविता ” माँ 

पिता का प्यार और माँ के सपनों की लिखावट हूँ मैं। हर सपनें माँ हमारी ;तुमसे शुरु होती है। क्योंकि तेरी सपनों की जीता-जागता हकीकत हूँ मैं । नौ महीने तक माँ तुने हर कष्टों को झेला , करवटे बदल बदलकर पर मैं हर पल माँ! तेरी बाँहों में खेला …

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पाखण्डवाद का पर्दाफाश करती उदय कुमार की कविता – ये है कैसा करवाचौथ..?

पाखण्डवाद का पर्दाफाश

पाखण्डवाद का पर्दाफाश करती यह कविता – ” ये है कैसा करवाचौथ..?” यह तथ्य है कि अपने पुरखों की प्रेरणा को मुकम्मल मकाम तक पहुंचाते बाबा साहेब अंबेडकर ने भारत की महिलाओं को ब्राम्हणवाद की चंगुल से मुक्त कराया। उठने , पढ़ने-लिखने, नौकरी करने, अपनी बात रखने , प्रसव के …

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धर्मशास्त्र द्वारा आधी-आबादी का दमन ( अगर मांगने से दुआ कबूल होती) -कविता

धर्मशास्त्र द्वारा आधी-आबादी का दमन

धर्मशास्त्र से आधी आबादी को अपने हक़ के लिए लड़ने को प्रेरित करती सूरज कुमार बौद्ध की कविता : -अगर मांगने से दुआ कबूल होती। धर्मशास्त्र : हजारों सालों से धर्मशास्त्रों के माध्यम से इस देश के आधी आबादी का दमन होता रहा। मनुस्मृति जैसे धर्मशास्त्र इस उत्पीड़न को धर्म …

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हे नारद, मेरी सुनो (कविता) – उदय मोहन पाठक (अधिवक्ता)

हे नारद

हे नारद ‘ : आजादी के इतने वर्ष बीत जाने जाने के बाद भी जब शोषित, पीड़ित, गरीब, लोगों को देखता हूँ तो मन में एक भाव आता है कि कोई ऐसा बहुजन हिताय कार्य करने वाला मसीहा अवतरित हो जो इनके पीड़ा को हर ले और समाज में समानता …

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कलमकारों के क़त्ल पर रूह कुरेदती सूरज कुमार बौद्ध की कविता – कलम की आवाज़

कलमकारों के क़त्ल

कलमकारों के क़त्ल पर रूह कुरेदती सूरज कुमार बौद्ध की कविता – कलम की आवाज़ (नरेंद्र दाभोलकर, कलबुर्गी, पनसारे,……. और अब गौरी लंकेश) नरेंद्र दाभोलकर, कलबुर्गी, पनसारे,……. और अब गौरी लंकेश। आए दिन अनेक लेखकों, पत्रकारों, कलमकारों को मौत की घाट उतार दिए जा रहे हैं। इन बेबाक आवाजों का …

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पन्ने: मेरी ज़िन्दगी के ये पन्ने, कुछ स्याह और कुछ सुर्ख पन्ने (कविता)

पन्ने

मेरी ज़िन्दगी के ये पन्ने कुछ स्याह और कुछ सुर्ख पन्ने कोई खुद-ब-खुद मुड़े तुडे से पन्ने किसी की यादें झट से उकेरने को, हमने मोड़ के रखे हुए हैं पन्ने कुछ गम कि आशुओ से, धुले हुए स्वेत पन्ने कुछ स्वेत स्याह से ज़िन्दगी की उन खौफ़ज़दा यादें मिटाने …

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तुम्हारी आँखे

झील सी गहरी ये तुम्हारी आँखे मदहोश मदभरी ये तुम्हारी आँखे भँवरे सी काली हैं गुनगुनाती हैं ये शोख काजल से भरी ये तुम्हारी आँखे बिन पूछे दिल में उत्तर जातीं हैं हैं कितनी शरारी ये तुम्हारी आँखे पलकें उठतीं नही झुकीं रहतीं हैं नींद से भारी तुम्हारी हे खुमारी …

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हमारे समय के दो पहलू

सत्यव्रत बुरा है हमारा यह समय क्योंकि हमारे समय के सबसे सच्चे युवा लोग हताश हैं, निरुपाय महसूस कर रहे हैं खुद को सबसे बहादुर युवा लोग सबसे ज़िन्दादिल युवा लोगों के चेहरे गुमसुम हैं और आँखें बुझी हुई। एकदम चुप हैं सबसे मज़ेदार किस्सागोई करने वाले युवा लोग, एकदम …

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उसकी जुबान पर सिर्फ रोटी लिखा है

न खाने पर लिखा है…न पानी पर लिखा है… न हवा पर लिखा है….न कफ़न पर लिखा है… तू हिन्दू है…या मुसलमान है….जाके किसी भूखे प्यासे से पूछ ! तेरा धर्म क्या है…? उसकी जुबान पर सिर्फ रोटी लिखा है….। This post was written by sanjay dash. The views expressed here …

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हम बढ़ते चलेंगे – सूरज कुमार बौद्ध 

अगर मानव अधिकारों के उल्लंघन को एक आधार मानकर देखा जाए तो भारत की पहचान एक जातीय हिंसा और उत्पीड़नकारी देश के रुप में की जाती है। यहां प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक, पंचायत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक हर जगह जातिवाद समाहित है। यह जातिवाद का दंश ही …

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शायद अब हमारी बारी है

मेला है, देखो मेला है भूखों का लगा ये मेला है क्या पार्टी, क्या झंडा कोई मंत्री आया है, फिर से वादे करने, झूठे सपने दिखाने, बातों में उलझाने, सुना है, ये भी गरीब था, पर क्या मेरे पेट की आग बुझा पायेगा ? मेरे बाप दादा भूख से मर …

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‘धीमी मौत’ – ये कविता पाब्लो नेरूदा नहीं बल्कि ब्राज़ीलियन कवयित्री मार्था मेदेइरोस की है

धीमी मौत कविता काफी प्रचलित है। इण्टरनेट पर अक्सर पाब्बल रूदा के नाम से शेयर होने वाली ये कविता असल में ब्राज़ीलियन कवयित्री मार्था मेदेइरोस की है। आगे से आप भी अगर धीमी मौत कविता शेयर करते हैं तो वहां कवि का नाम सही कर लें। हिन्दी में इसके कई …

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“मैं हूँ नेता “

पहले कीमतें मैंने बढाई फिर मैंने कहा मेरे पास जादू की छड़ी नहीं है भाई जो मैंने यूँ घुमाई और खत्म हो जाएगी महंगाई मैं हूँ नेता , कुछ नही देता बस लेता ही लेता कभी मैं तुमसे नोट लेता कभी मैं तुमसे वोट लेता और बदले में लूट लेता …

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निष्क्रिय प्रतीक्षा का अवसरवादी तर्क (कविता )

”जब बदलाव करना सम्‍भव था मैं आया नहीं: जब यह ज़रूरी था कि मैं एक मामूली सा शख्‍़स, मदद करूँ, तो मैं हाशिए पर रहा।” (बेर्टोल्‍ट ब्रेष्‍ट: ‘सेण्‍ट जोन ऑफ दि स्‍टॉकयार्ड्स’) गतिरोध की स्थिति जब समाज को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है और प्रतिक्रिया और पुनरुत्‍थान का अँधेरा …

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तुम्हे याद हो कि न याद हो

तुम्हे याद हो कि न याद हो “पुरखे हमारे थे बादशाह, तुम्हे याद हो कि न याद हो। अब भारत में हम है तबाह, तुम्हे याद हो कि न याद हो। इतिहास में जो नामवर , थे वीर पराक्रमी धनुर्धर। थे सभ्यता में अग्रसर, तुम्हे याद हो कि न याद …

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फर्जी गौरक्षकों की पोल खोलती सूरज कुमार बौद्ध की कविता : गौरक्षक या नरभक्षक?

        आज देश में गौ रक्षा के नाम पर गुंडागर्दी इस तरह से बढ़ चुकी है की अब आम नागरिक अब गाय के खरीद फरोख्त से भी डरता है। गाय के नाम पर आए दिन मजलूमों और मुसलमानों की हत्या की जा रही है। गाय खाना पाप …

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“ईश्वर* नहीं है।”

मुझे पता है कि दुनिया में कोई दैवीय शक्ति नहीं है तो फिर क्यों आस्था के नाम पर हमें इनसे डराया जाता जो चीज नहीं है उसके होने और मानने के लिए आस्था का सहारा क्यों लिया जाता है मैं पूछता हूँ ये बेबुनियाद तर्क किसने इजाद किए कि ईश्वर* …

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आज जागा तो हूँ

हाँ, आज जागा तो हूँ लेकिन दर्द रहता है जो सदियों पहले घाव लगा था वो आज भी ताजा रहता है कभी क्षेत्र,कभी गरीबी,कभी औरत तो कभी जाति के नाम पे दुत्कारा जाता हूँ सारे सवाल एक हैं पर खुद की नज़र बदलती रहती है और कभी प्यार कभी आशा …

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तिल-तिल कर मरती रहती हूं, तब भी मॉं कहलाती हूँ।।

बोली भैंस गाय से बहना, मुझको भी कुछ सिखलाओ। क्यों माता माता बोलें नर तुमको, मुझको भी बतलाओ।। जाति धर्म में पड़कर , जो निश दिन लड़ते रहते हैं। निज मां का सम्मान नहीं,पर तुमको माता कहते हैं।। खेल कौन खेला है तुमने, वशीभूत किया है कैसे। मदिरा के शौकीन …

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आवाम की आजादी…

हम आवाम को आजाद कैसे मान लें, सिंहासन पर सीमित परिवार का दौर है। गरीबों को दो जून भोजन नसीब नहीं, GDP बढ़ा रही सरकार का दौर है। हर वस्तु की “कीमत” है इस जमाने में, मूल्य नहीं समझती यह बाजार का दौर है। विकास विकास करके जमीन हथिया रहे, …

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