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विकास विकास न हुआ, रीतिकालीन नायिका का 'कंगना' हो गया है

प्रगति की पेंटिंग में विकास को देखना, एक व्यंग्य… दुर्गेश यादव”गुलशन”

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विकास विकास न हुआ, रीतिकालीन नायिका का ‘कंगना’ हो गया है जिसे वह नदिया किनारे गुमा आई है और गा गाकर ना मिल पाने की व्यथा व्यक्त कर रही है ।
इधर कुछ लोग विकास के विरह में ऐसे पगला रहे हैं कि कव्वाली की पंक्तियों की तरह एक ही बात बार बार दोहरा रहे हैं। तब से लेकर आज तक हालंकि कई नदियां सूख गई है, कई दरोगा बदल गए हैं और रीतिकालीन नायिकाओं पर कई शोध लिख दिए गए हैं, फिर भी विकास का कंगना अभी तक ‘गुम जाने, के स्टेटस से ‘बरामद हुआ’ वाले स्टेटस पर नहीं आ सका है। माजरा किसी बड़े नामी चित्रकार की एब्सट्रेक्ट पेंटिंग की तरह हो गया है। पेंटिंग में चित्रकार ने विकास को घास के रूप में चित्रित किया है जैसे 3D फिल्मों को देखने के लिए एक पोलेराइड चश्मा लगाना पड़ता था वैसे ही आर्ट गैलरी में आए सभी दर्शकों को प्रवेश द्वार पर ही हरे कांच का चश्मा यह कहकर उपहार में दिया जा रहा है कि इससे पेंटिंग ‘अच्छी’ दिखाई देगी। जिन्होंने यह चश्मा लगा लिया है उन्हें पेंटिंग की ऊसर  जमीन पर भी हरी घास नजर आ रही है।

कुछ दर्शक चित्रकार के इतने बड़े भक्त हैं कि उन्हें घोड़े की लीद भी हरी कच्च दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है मानो उन्हें सावन के महीने में ही आंखों में मोतियाबिंद हुआ है। लेकिन दर्शक भी भाति भाति के होते हैं।तो यहां भी हैं कुछ ऐसे जिन्हें कि कहीं घास का तिनका तक नजर नहीं आ रही है। ऐसे लोगों को समझाने के लिए पेंटर बाबू की कुछ टुकड़ियां तैयार बैठी है। उन्हें यह कहकर समझाया जा रहा है कि पूरे कैनवास पर घास ही घास थी जिसे पेंटिंग के बनने से लेकर गैलरी में आने के बीच में घोड़ा चर गया है।

दर्शकों में कुछ ऐसे भी हैं जो अपने बाप को बाप कहने से पहले उसके बाप होने का सबूत मांगते हैं। उनकी मांग है कि उन्हें घास दिखाई जाए। अगर घास घोड़े ने चर ही ली है तो घोड़े पर कोई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ टाइप बात क्यों नहीं की गई?अगर घास चरते घोड़े को आपने पकड़ कर कांजी हाउस में जमा कर ही दिया हो तो उसकी पावती दिखाई जाए।

छायावादी युग के कवियों को प्रकृति के कण कण में प्रेम दिखता और संगीत सुनाई देता था।उसी तरह विकास वीरों को चोर भरी आवाज में भी विकास का संगीत सुनाई देता है हर धुंधले इस दृश्य में विकास ही विकास नजर आने लगता है।वह कुछ इस सम्मोहक ढंग से दिखाने और सुनाने में लगे हैं कि अंधे को दृष्टि व बधिरों को श्रवण शक्ति प्राप्त हो गई है।

दुर्भाग्य से हमारे बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने विकास फूटी आंख भी नहीं देखने की कसम खा रखी है। विकास के तो नाम से ही उन्हें कुछ ऐसी नफरत है कि अपने बच्चों के जन्म के समय किसी भावना बस विकास नाम रख दिया था, अब शपथ पत्र देकर बदलवाना चाहते हैं। इसी नफरत के चलते एक मित्र ने तो बेटी के लिए एक बड़ी कंपनी के लाखों के पैकेज वाले लड़के का प्रस्ताव सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उसका नाम विकास है।

विकासऔर विनाश की बातें करने वालों के सुर कभी कभी इतने ज्यादा मिल जाते हैं कि कभी-कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि बंदा विकास की बात कर रहा है या विनाश की! कुछ के नाम से ही इतने भयभीत हैं कि उन्होंने उसे बकायदा पागल घोषित कर दिया है। कानून के जानकारों का कहना है कि अगर परिवार का कोई सदस्य पागल हो जाता है तो आप उसे अपनी तमाम संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। शायद उनका दाम यह हो कि कल को अगर विकास सचमुच सामने आ जाए तो उसकी कोई कीमत उन्हें ना चुकानी पडे, क्योंकि विकास ‘पागल’ जो ठहरा।।

द्वारा:-दुर्गेश यादव”गुलशन”

 

This post was written by durgesh yadav gulshan.

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About durgesh yadav gulshan

हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। मैं दुर्गेश यादव "गुलशन" पूर्ण रूप से भारतीय मूलनिवासियो को उनको उनका हक और अधिकार दिलाने के लिए समर्पित हूँ। संपर्क:बवंधर,जवा,रीवा, मध्यप्रदेश मो.9118489349,7581038809

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