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बाबा साहेब अम्बेडकर/ आरक्षण
आरक्षण व्यवस्था के द्वारा समाज में परिवर्तन किया जा सकता है।

आरक्षण : सामाजिक परिवर्तन का हथियार – दुर्गेश यादव “गुलशन”

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7 आरक्षण व्यवस्था के द्वारा समाज में परिवर्तन किया जा सकता है। समाज में जाति व्यवस्था के नाम पर भेदभाव किया जाता है। मनुवादी व्यवस्था का जाल इतना मजबूत है कि इसे भेदने के लिए समाज में आरक्षण व्यवस्था को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। आरक्षण के द्वारा दलितों को उनके अधिकार क़ानूनी रूप से दिलाये जा सकते है, क्योंकि उच्च जाति वर्ग अपनी इच्छा से तो कोई अधिकार देगा नही।

समाज में लम्बे समय से जाति वैमनस्य विद्यमान है। हिन्दू शास्त्रो तथा वेदो के अनुसार चार वर्ण है। ये चार वर्ण है-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। इस सबको ब्रम्हा के शरीर की उतपत्ति कहा गया है। विवेक व विज्ञान के अनुसार यह बात बहुत आश्चर्यजनक तथा हास्यापद है कि अकेले ब्रम्हा ने नारी के सहयोग के बिना इतनी बडी जनसंख्या की उत्पति की होगी। आज के समय में तो कोई अकेले पुरुष एक भी संतान पैदा नही कर सकता।

स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने वाला ब्राह्मण वर्ग समाज के शिखर पर बैठ गया। अपनी सेवा कराने के लिए क्षत्रियो तथा वैश्यों का इस्तेमाल किया और शूद्रों से अपनी सेवा कराने के लिए उनके साथ पशुओ से भी बुरा व्यवहार किया। स्वयं कभी कोई सेवा कार्य नही किया। बल्कि अपने आराम भोग-विलास के लिए शूद्रों के साथ हमेशा घोर अत्याचार किया। शूद्रों के सारे अधिकारो को छीन लिया। अमानवीय जीवन जीने के लिए मजबूर किया।

ऐसी कठिन परिस्थितियों में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर दलितों, पिछडो के मसीहा की तरह उभरकर सामने आए। उन्होंने पहले स्वयं को शिक्षित बनाया। फिर वंचित ज्ञान और बुद्धि द्वारा ब्राह्मणों के अत्याचारों का कड़ा विरोध किया। देश में अपने लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जगाया। बाबा साहब ने देश विदेश में अपने लोगों के अधिकारों की मांग की। उनके साहस और संघर्ष से तथा कथित उच्च वर्ग की नींद उड़ गई।

सर्वप्रथम 1931 में लंदन में ब्रिटानिया सरकार ने गोलमेज कांफ्रेंस की, जिस में हिंदू मुस्लिम सिख को व दलित पिछड़े को भावी शासन व्यवस्था में भाग लेने की बात कही गई थी। परंतु वहां सर्वसमत्ति से कोई निर्णय ना हो सका। ब्रिटिश सरकार पर फैसला छोड़ दिया गया। 17 अगस्त 1932 को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने एक घोषणा पत्र घोषित किया। यह कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना जाता है। इस घोषणा पत्र के द्वारा पहली बार अछूतों को कुछ राजनैतिक अधिकार देने की बात की गई थी। उसमें दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की गई थी, यह 20 वर्षों के लिए तय की गई थी। इसके विरोध में महात्मा गांधी ने पूना की यरवदा जेल में आमरण अनशन किया था। बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी ममता, करुणा व मानवता का परिचय देते हुए गांधी जी की जान बचाई। परिणाम स्वरुप 24 सितंबर 1932 को दोनों नेताओं के मध्य एक समझौता हुआ जिसे “पूना पैक्ट” के नाम से जाना जाता है।

बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर भलीभांति समझ चुके थे कि मनुवादी विचारधारा के लोग दलितों के अधिकारों के हनन के लिए स्वयं को किसी भी हद तक गिराने के लिए तैयार हैं। बाबा साहब ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की और दलितों के अधिकारों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया। अछूतों की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था सुधारने के लिए आरक्षण व्यवस्था ही एकमात्र उपाय था संविधान के द्वारा जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति को 15% तथा अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई। आरक्षण के द्वारा अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को भी सरकारी नौकरियों में तथा शिक्षा के क्षेत्रों में अधिकार प्राप्त हुए। संविधान के अनुच्छेद 340 के अंतर्गत में मंडल आयोग का गठन किया गया था जिसकी रिपोर्ट 1980 में आई थी। जिसमें ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गयी। आरक्षण के कारण ही दलितों की स्थिति में सुधार देखने को मिलता है। वास्तव में यह सुधार शहरो तक अधिक सीमित है। मनुवादी विचारधारा के लोग दलितों के स्थिति में सुधार को देखकर बौखलाए रहते हैं यह आरक्षण के लाभ को कम करने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। इसी कारण आरक्षण का सभी क्षेत्रों व स्थानों पर पूरा लाभ नहीं मिल पाया।

कोई भी समाज चौमुखी विकास तभी कर सकता है जब समाज में सभी वर्गों को अपने सर्वांगीण विकास के अवसर समान रूप से प्रदान हो। समाज का विकास होने से देश का विकास स्वतः होता है। विश्व में देश की पहचान बनती है इस पहचान को मजबूत बनाने के लिए आरक्षण व्यवस्था का होना बहुत जरूरी है। आरक्षण व्यवस्था समाज के विकास में एक औषधि का कार्य करती है। जैसे किसी माता पिता की 4 संतान होती है कोई एक बीमार हो जाए तो ऐसी अवस्था में उसे अन्य की तुलना में अतिरिक्त भोजन व देखभाल दी जाती है। जिससे कि वह शीघ्र अन्य के समान हो जाए।समाज के दलित वर्ग को उठाने के लिए आरक्षण व्यवस्था को अभी कुछ और समय तक इमानदारी से जारी रखना चाहिए। देश के विकास में सभी वर्गों की भागीदारी समान रूप से आवश्यक होती है। इसमें उच्च जाति वर्ग को कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए। क्योंकि ब्राह्मण नीति से उनके अधिकारों या सामाजिक मान सम्मान में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आती है सबको अपनी आजीविका कमाने तथा सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार होना चाहिए।इस व्यवस्था को उन्हें स्वीकार करना चाहिए। किसी भी समाज में एक बड़ी संख्या में लोगों को गुलाम बनाकर रखने से समाज व देश का संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। इसीलिए सभी को अपने राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक अधिकार समान रुप से बिना किसी भेदभाव के सुलभ होने चाहिए।

आज उदारीकरण और खुली अर्थव्यवस्था का दौर चल रहा है जिसमें समाज व देश को कई फायदे हुए हैं। इसके साथ ही निजीकरण की व्यवस्था भी समाज में व्याप्त हो रही है। निजी क्षेत्र में कार्य करने के घंटे बड़े तथा वेतन कम हुआ है। कार्य करने की सुविधाएं भी समान नहीं होती है। इसके साथ साथ जाती व लिंग के आधार पर भेदभाव भी अधिक होता है। सामान्य कार्य के लिए भी वेतन में असमानता पाई जाती है निम्न स्तर पर कार्य करने वाले लोगों को शोषण से बचाने के लिए आरक्षण व्यवस्था को निजी क्षेत्रों में भी लागू करना चाहिए। निजी सेक्टर में दलितों पिछड़ों को अपनी योग्यता के आधार पर उच्च पद प्राप्त हो इसके लिए रिजर्वेशन की प्रक्रिया निजी क्षेत्रों में भी लागू होनी चाहिए। ताकि समाज के सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त हो सके।

 

This post was written by durgesh yadav gulshan.

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हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। मैं दुर्गेश यादव "गुलशन" पूर्ण रूप से भारतीय मूलनिवासियो को उनको उनका हक और अधिकार दिलाने के लिए समर्पित हूँ। संपर्क:बवंधर,जवा,रीवा, मध्यप्रदेश मो.9118489349,7581038809

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