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संसद चले लेकिन प्रश्नकाल ना हो ऐसा तो मोदी राज में ही संभव है 

मेडिकल स्टाफ सुरक्षा किट पहन जिम्मेदारी निभा सकते हैं तो सांसदों को सुरक्षा किट पहनकर क्यों सत्र नहीं चल सकता

देश की आर्थिक हालत

किसी लोकतंत्र में यदि संसद चले और सांसद प्रश्न ना कर सकें तो समझ लेना कि लोकतंत्र पर खतरा मंडरा रहा है। या फिर लोकतंत्र को तानाशाही का चोला ओढा दिया गया है। वही तानाशाही दृश्य अब भारत के लोकतंत्र में दिख रहा है। यहाँ की वर्तमान सत्ता तानाशाही तरीके से प्रश्नकाल न करवा जनता के प्रश्नों से भागने का साफ़ रास्ता चुना है।

दुनिया के सभी देश कोविड-19 से अस्त व्यस्त हैं, लेकिन उनकी लोकतांत्रिक व्यवस्था यथावत बहाल है और मिलकर इस संकट से उबरने का रास्ता निकाल रहे है। लेकिन भारत में तो कहानी उलट है। मोदी सत्ता ने पहले ही सांसदों के 2 वर्ष तक का संसद मद समाप्त कर दिया है। यानी 2 वर्ष तक सांसदों को उनके क्षत्रों के विकास के लिए किसी प्रकार का वित्तीय मद नहीं दिया जाएगा। 

और अब इस सत्र में प्रश्नकाल समाप्त कर उनके बचे-खुचे अधिकार भी समाप्त करने की तैयारी कर ली गयी है। ज्ञात हो कि देश की अर्थव्यवस्था को मोदी सत्ता ने गर्त में पहुँच चुकी है। देश का जीडीपी 24% ऋणात्मक हो गया है। इस ऐतिहासिक गिरावट ने देश की आर्थिक हालत चरमरा कर रख दिया है। अब सरकार देश के संशाधनों को बेचने पर अमादा है। 

कोविड-19 से निबटने में विफल सरकार प्रश्नकाल न करवा जनता के प्रश्नों से चाहती है भागना  

कोविड-19 से निबटने में पूरी तरह विफल सरकार अपने इस कदम से जनता के सवालों से भागने का प्रयास कर रही है। लगभग 20 करोड़ नौकरियाँ चली जाने से देश में भयानक बेरोज़गारी का बमबारी हुई है। तेल के कीमतों में बेतहाशा वृद्धि से महँगाई सर चढ़ कर बोल रही है। आज जब नोटबंदी व जीएसटी का सच सामने आया है तो मोदी सत्ता प्रश्नकाल न करवा कर प्रश्नों का सामना करने से डर रही है।

हालांकि, इस सरकार ने सवालों से बचने के लिए अपने शुरूआती वक़्त से ही तैयारी करना शुरू कर दी थी। तभी तो मोदीजी के ऑफिसियल साईट पर आप नहीं पूछ सकते। कई प्रत्यक्ष गवाही देते हैं कि सवाल करने वालों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया है।  

मसलन, कार्यशैली को देख कर प्रतीत होता है कि सरकार कोविड -19 का उपयोग अपनी विफलताओं को छुपाने के लिए कर रही है। इस महामारी के आड़ में केंद्र सरकार ने नागरिकों के आंदोलनों को कुचल कर अपनी एजेंडों को आगे बढ़ाया है। इस अवधि मे इनके द्वारा कई जनविरोधी बिल बिना विरोध के पिछले दरवाजे से पास हुए। लोकडाउन के हालत में ना विपक्ष और ना ही नागरिक मंचो द्वारा विरोध किया जा सका।

कोविड-19 वह बहाना है, जिसे आड़ में लोकतंत्र का अपहरण किया गया है। ऐसे में यह समझा जा सकता है कि क्यों संसद तो चलेगा लेकिन प्रश्नकाल नहीं होंगे। क्या देश हित के लिए सांसदों को सुरक्षा किट पहनकर सत्र नहीं चलाया जा सकता। किया तो सब कुछ जा सकता है, लेकिन तब जब सरकार का ज़मीर जिन्दा हो।।बिद्रोही।।

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