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Tag Archives: osh_vayayng

प्रगति की पेंटिंग में विकास को देखना, एक व्यंग्य… दुर्गेश यादव”गुलशन”

प्रगति की पेंटिंग का विकास

विकास विकास न हुआ, रीतिकालीन नायिका का 'कंगना' हो गया है जिसे वह नदिया किनारे गुमा आई है और गा गाकर ना मिल पाने की व्यथा व्यक्त कर रही है ।

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प्रणाम : चारेां महानुभावों को मेरा प्रणाम! –उदयमोहन पाठक (अधिवक्ता)

प्रणाम

एक किसान कही जा रहा था। रास्ते में उसे चार आदमी मिले। किसान ने उन्हें स्वभाववश प्रणाम किया और आगे बढ़ गया। कुछ आगे बढ़ते ही चारों यह कहकर आपस में लड़ने लगे कि किसान ने मात्र उसे प्रणाम किया। उन्होंने किसान को बुलाकर पूछा भाई तुमने किसे प्रणाम किया? …

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हर साल की भांति इस साल भी (व्यंग्य) –उदयमोहन पाठक (अधिवक्ता)

हर साल की भांति इस साल भी

हर साल की भांति इस साल भी यह संवाद सूनते-सुनते अरसा गुजर गया। कभी उकताहट होती है कि लोग इसे बदलते क्यों नहीं? एक जगह ग्रामीण मेला लगा हुआ था। मेले में ही माइॅक से आवाज गूँज रही थी। ‘‘ हर साल की भांति इस साल भी’ सुनकर अच्छा लगा …

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शार्क और छोटी मछलियां : धर्मं भी अवश्य होगा… बेर्टोल्‍ट ब्रेष्ट की लघुकथा

शार्क और छोटी मछलियां

“यदि शार्क मनुष्‍य हो जाएं तो क्‍या वे छोटी मछलियों से भला व्‍यवहार करेंगी?” श्रीयुत के. की मकानमालकिन की छोटी पुत्री ने उनसे पूछा। ‘अवश्‍य’, उसने उत्‍तर दिया, यदि शार्क मनुष्‍य हो जाएं तो वे छोटी मछलियों के लिए मजबूत बक्‍से बनवा देंगी। उन बक्‍सों में वे सब प्रकार के …

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ढूंढते रह जाओगे… (अपनी छोटी-बड़ी समस्यायों के समाधान) -उदय मोहन पाठक

ढूंढते रह जाओगे...

ढूंढते रह जाओगे… दस-दस फीट के दस गड्ढे खेादने के बजाय एक सौ फीट का कुआॅं खोद लो, पानी जरूर मिलेगा। अन्यथा छोटे-छोटे गड्ढों में पानी ढूॅंढ़ते रह जाओगे कम उम्र से ही लोग अपनी छोटी-बड़ी समस्या के समाधान के लिए ईश्वर को ढूंढते रहते हैंं, शायद कभी किसी समस्या …

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दो नाक वाले लोग –प्रसिद्ध व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई की कलम से

दो नाक वाले व्यंग (हरिशंकर परसाई)

दो नाक वाले लोग: मैं उन्हें समझा रहा था कि लड़की की शादी में टीमटाम में व्यर्थ खर्च मत करो। पर वे बुजुर्ग कह रहे थे- आप ठीक कहते हैं, मगर रिश्तेदारों में नाक कट जाएगी।   नाक उनकी काफी लंबी थी। मेरा ख्याल है, नाक की हिफाजत सबसे ज्यादा …

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सहज व्यापार : यह व्यवसाय बहुत ही लाभप्रद है – उदयमोहन पाठक (अधिवक्ता)

सहज व्यापार

सहज व्यापार : एक सज्जन हाल में ही गुरु-दीक्षा लेकर आए। दो-चार सप्ताह तक उनमें शिष्यत्व का भाव रहा। एक सच्चे सेवक की भाँति, जो भी उनके समीप जाता, उसके समक्ष गुरुवचन की थाली परोस देते। जब उन्हें पता चला कि उनके करीबी लोग उनकी बातों से प्रभावित हो रहे …

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फिर भी जीना सीख लिया : क्या तुम जिन्दा हो? -उदयमोहन पाठक, अधिवक्ता

फिर भी जीना सीख लिया

फिर भी जीना सीख लिया : मुझे जिन्दा देखकर वे सहम गए। बोले, क्या तुम वाकई जिन्दा हो? मैंने कहा कोई शक। बोले यकीन नहीं होता। मैंने तुम्हारे जीने के सारे रास्ते बंद कर दिये। तुम्हारी कमाई और महंगाई के बीच बड़ा फासला बनाया, तुम्हें रोजगार से विमुख किया ताकि …

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