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Unemployment : सरकार के दावों के बावजूद बेरोजगारी का गहराता संकट

Unemployment

भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के चुनाव प्रचार में रोजगार को मुख्य मुद्दा बनाया था। हर साल राज्य में रोजगार (Unemployment) के भरमार या अवसर निर्माण के नाम पर कई योजनाओं की शुरुआत की। ऐसे में सरकार द्वारा सीएमआईई की रिपोर्ट सार्वजनक न करना यही साबित करता है कि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के रिपोर्ट ने सरकार का सब गुड गोबर कर दिया है।

सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार 2013-14 से बेरोजगारी (Unemployment) लगतार बढ़ती रही और 2018 में यह बढ़ोतरी और तेज हुई। नतीजतन 2018 में देश के एक करोड़ 90 लाख लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। साथ ही दिसंबर में बेरोजगारी (Unemployment rate) दर बढ़ कर 7.4 प्रतिशत हो गई जो पिछले 15 महीनों में सबसे अधिक है। इस रिपोट यह भी कहा गया है कि 2018 में दिहाड़ी और खेतों में मजदूरी करने वाली ज्यादातर ग्रमीण महिलाओं ने अपना काम खोया। सरकार के उद्यमशीलता और स्वरोजगार पर जोर देने जैसे आडम्बर के चलते महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून हाशिए पर चला गया। जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी थी।”

ईपीएफओ के तथ्यांक के आधार पर सोलापुर मामले जिसमे नई नियुक्तियों के नाम पर पुराने कर्मचारियों का पंजीकरण कराया जाना सरकार के रोजगार निर्माण के दावे को भ्रामक करार देता है। साथ ही यह भी साबित करता है कि सरकार रोजगार निर्माण करने वालों को लाभ नहीं पहुंचा रही बल्कि इस कानून का उल्लंघन करने वालों को फायदा पहुंचा रही है।

मसलन, हाल में सम्पन्न विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार के पीछे का मुख्य कारण यही बढ़ती बेरोजगारी और कृषि संकट रही। इसके बावजूद इस समस्या के समाधान की दिशा में पर्याप्त नीतिगत और प्रक्रियागत कदम नहीं उठाया जाना यह साबित करता है कि सरकार को इससे कोई लेना देना नहीं है। इन्हीं रवैये के कारण आगामी लोकसभा एवं झारखंड के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ेगा।

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